आवड़ माता स्वांगिया जी की आरती जय गिरवर राया — Lyrics, अर्थ व भावार्थ 2026

आवड़ माता की आरती जय गिरवर राया — Aavad Mata Aarti Lyrics, अर्थ व भावार्थ 2026

आवड़ माता की आरती जय गिरवर राया का सम्पूर्ण lyrics, हिंदी अनुवाद, छंद-वार भावार्थ, मामड़ जी चारण, तेमड़ी पर्वत और जैसलमेर की कुलदेवी स्वांगिया जी का रहस्य।

✍️ 📅 प्रकाशित: 🔄 अपडेटेड: ⏱️ पढ़ने का समय: ~12 मिनट

1. आरती परिचय — आवड़ माता और स्वांगिया जी

यह आरती माँ आवड़ (स्वांगिया जी) की महिमा का बहुत ही सुंदर और ऐतिहासिक वर्णन है। माँ आवड़ को माँ करणी से पहले का अवतार माना जाता है, जो मामड़ जी चारण के घर अवतरित हुई थीं। इस आरती में उनके द्वारा किए गए चमत्कारों और उनकी दिव्य शक्ति का उल्लेख है।

💡 जानें: आवड़ माता का सम्पूर्ण इतिहास — जन्म, तेमड़ी पर्वत, चमत्कार और जैसलमेर की कुलदेवी।

माँ आवड़ को हिंगलाज माता का अवतार माना जाता है और वे जैसलमेर राजवंश की कुलदेवी हैं। उन्होंने मरुधरा की रक्षा के लिए अनेक चमत्कार किए।

🔑 आरती के मुख्य शब्दों का रहस्य

शब्द अर्थ भाव
गिरवर राया पहाड़ों की रानी तेमड़ी पर्वत की अधिष्ठात्री
आदि सगती आदि शक्ति संसार की मूल चेतना
मामड़ मामड़ जी चारण भक्त और पिता
स्वांगिया जी स्वांग (भाला) धारणी मुड़े हुए भाले वाली माँ
डाढाली दाढ़ी-मूंछ वाली ओजस्वी तपस्विनी स्वरूप

2. मंगलाचरण — जय गिरवर राया

जय गिरवर राया, मैया जय गिरवर राया!
आवड़ आदि सगती, मामड़ घर आया ! ॐ जय गिरवर…
अनुवाद: हे गिरवर राया (पहाड़ों की रानी/गिरिराज पर वास करने वाली माँ)! आपकी जय हो। आप ही इस संसार की 'आदि शक्ति' (सगती) हैं, जो भक्तों के कष्ट दूर करने के लिए जैसलमेर के प्रसिद्ध भक्त मामड़ जी चारण के घर उनकी पुत्री के रूप में प्रकट हुईं।
भावार्थ: मामड़ जी के कोई संतान नहीं थी, उन्होंने हिंगलाज माता की कठिन तपस्या की थी, जिसके बाद माँ स्वयं उनकी पुत्री बनकर आईं। माँ आवड़ उन सातों बहनों में सबसे बड़ी और ओजस्वी थीं। उन्हें 'गिरवर राया' इसलिए कहा गया क्योंकि उन्होंने जैसलमेर के तेमड़ी पर्वत को अपना निवास स्थान बनाया था।

3. छंद 1 — माड़ धारा बिच माजी, चारण कुळ चाया

마ड़ धारा बिच माजी, चारण कुळ चाया!
आप अवतरया अम्बे, साँसण सुरराया! जय गिरवर ….
अनुवाद: हे माता! आपने 'माड़ धरा' (जैसलमेर और मरुस्थल का प्राचीन नाम) को अपनी चरण धूलि से पवित्र किया और चारण कुल में जन्म लेकर उस वंश की कीर्ति को चारों ओर फैलाया ('कुळ चाया')। हे अम्बे! आप देवताओं के भी राजा (सुरराया) के समान पूजनीय हैं और शासन (संसार या राजकीय भूमि) पर आपका ही एकाधिकार है।
भावार्थ: जैसलमेर की इस सूखी और तपती रेतीली भूमि को 'माड़ धरा' कहा जाता था। इस क्षेत्र को माँ ने अपने चरणों से पवित्र किया। 'साँसण' शब्द का राजस्थानी संस्कृति में बड़ा महत्व है—राजाओं द्वारा संतों या चारणों को जो कर-मुक्त भूमि दी जाती थी, उसे साँसण कहते थे। यहाँ इसका अर्थ है कि हे माँ! आप इस मरुधरा की साक्षात शासक हैं। आपकी कीर्ति से पूरा चारण कुल धन्य हो गया है, और देवता भी आपको शीश नवाते हैं।

4. छंद 2 — सिंध मैं आय सगती, समंदर सुकवाया

सिंध मैं आय सगती, समंदर सुकवाया!
पेट माय परमेश्वरी, महासागर पाया! ॐ जय गिरवर…
अनुवाद: जब सिंध के क्रूर शासक हमीर सुमरा के अत्याचार बढ़ गए और जैसलमेर के भाटी शासकों को रास्ता चाहिए था, तब आपने सिंध नदी और समुद्र के मार्ग को अपनी दिव्य शक्ति से सुखा दिया था। हे परमेश्वरी! आपने उस पूरे महासागर के जल को अपनी अंजुली में लेकर अपने उदर (पेट) में समाहित कर लिया था। यह आपकी असीमित शक्ति का प्रमाण है।
भावार्थ: जब सिंध के हाकिम (उमर सुमरा) की बुरी नजर माँ आवड़ की बहनों पर थी, तब माँ आवड़ अपने पूरे परिवार और भाटी राजपूतों के साथ सिंध छोड़कर माड़ (जैसलमेर) की तरफ आ रही थीं। मार्ग में सिंध नदी और समुद्र बाधक बने। माँ ने अपनी अलौकिक शक्ति से उस अथांग जलराशि को अपनी अंजलि (हाथ की ओट) में लिया और एक ही घूंट में पी गईं (उदरस्थ कर लिया)। यह घटना अगस्त्य मुनि द्वारा समुद्र सुखाने की पौराणिक कथा की याद दिलाती है। भक्त चकित होकर कहता है कि हे परमेश्वरी! आपके उस छोटे से भौतिक स्वरूप के भीतर पूरा महासागर समा गया, यह आपकी विराटता का प्रमाण है।

5. छंद 3 — भुजंग डस्यो निज भ्राता, पीयूष ला पाया

भुजंग डस्यो निज भ्राता, पीयूष ला पाया!
भोर उगत भगवती, लोवड़ लुकवाया!ॐ जय गिरवर…
अनुवाद: जब माँ आवड़ के भाई (मेहराजी) को एक काले नाग (भुजंग) ने डस लिया और वे प्राणहीन होने लगे, तब आप उनके लिए पाताल लोक से अमृत (पीयूष) लेकर आईं। सूर्योदय होने से पहले अमृत पहुंचना जरूरी था, इसलिए हे भगवती! आपने भोर (सुबह) उगते ही सूर्य देव को अपनी 'लोवड़ी' (राजस्थानी ओढ़नी) के पीछे छिपा दिया (लुकवाया) ताकि समय रुक जाए और आपके भाई को जीवनदान मिल सके।
भावार्थ: जब सूर्य देव उदय होने लगे, तो माँ ने समय चक्र को रोकने के लिए अपनी 'लोवड़ी' (सफेद-लाल रंग की चारणी ओढ़नी जो शक्ति का प्रतीक है) को आकाश में फैला दिया और सूर्य को उसके पीछे छिपा (लुकवाया) दिया। प्रकृति का नियम माँ की ओढ़नी के सामने ठहर गया। माँ पाताल से अमृत लाईं, भाई को जीवित किया और फिर सूर्य को मुक्त किया। यह पंक्ति दिखाती है कि माँ प्रकृति के नियमों से ऊपर हैं।

6. छंद 4 — देत्य मार डाढाली, गिरी खो गड़वाया

देत्य मार डाढाली, गिरी खो गड़वाया!
आप सिला दे आडी, थान ऊपर थाया! ॐ जय गिरवर…
अनुवाद: हे 'डाढाली' (दाढ़ी-मूंछ वाले ओजस्वी स्वरूप वाली माँ)! आपने दुष्ट दैत्यों का संहार किया और उन्हें पहाड़ों की गुफाओं (गिरी खो) में गाड़ दिया। इसके बाद, आप स्वयं एक विशाल पर्वत की शिला के रूप में वहां आड़ी (रक्षक बनकर) स्थापित हो गईं। आज उसी पवित्र स्थान पर आपका 'थान' (दिव्य मंदिर) सुशोभित है जहाँ भक्त आपकी पूजा करते हैं।
भावार्थ: माँ आवड़ हाथ में एक मुड़ा हुआ भाला रखती थीं, जिसे 'स्वांग' कहा जाता है (इसी कारण इनका नाम स्वांगिया जी पड़ा)। माँ ने दुष्टों को मारकर पहाड़ों की खोह में दबा दिया और स्वयं उस क्षेत्र की रक्षा के लिए एक 'शिला' (चट्टान) की तरह आड़ी खड़ी हो गईं, ताकि कोई बुराई फिर से मरुधरा में प्रवेश न कर सके। आज जैसलमेर के दुर्ग और तेमड़ी राय के थान (मंदिर) पर माँ इसी अडिग रूप में पूजी जाती हैं।

7. छंद 5 — बकर मद बाराऊ, छिक आनंद छाया

बकर मद बाराऊ, छिक आनंद छाया!
चढ़त पूज नित चंडी, भैसा मन भाया! ॐ जय गिरवर…
अनुवाद: प्राचीन शक्ति और वीर परंपरा के अनुसार, माँ चंडी के इस रूप को प्रसन्न करने के लिए विशेष द्रव्यों (मद/सोमरस) और प्रतीकात्मक वीर भोग अर्पण किए जाते थे, जिससे चारों ओर आनंद की वर्षा होती थी। हे चंडी! आपकी नित्य पूजा होती है और दुष्ट महिषासुर का वध करने वाली माँ के रूप में आपको यह वीर आराधना प्रिय है।
भावार्थ: यह पंक्ति माँ के 'चंडी' और 'महिषासुरमर्दिनी' स्वरूप को दर्शाती है। राजस्थान की प्राचीन वीर परंपरा में, युद्ध पर जाने से पहले या संकट काल में शक्ति को 'मद' (कारण द्रव्य/सोमरस) और 'बलि' (प्रतीकात्मक रूप से बकरे या भैंसे की) अर्पित की जाती थी। यह तामसिक और राजसिक ऊर्जा को नियंत्रित करने की तांत्रिक पूजा का वर्णन है, जिससे दुष्ट शक्तियां शांत होती हैं और चारों ओर 'आनंद की छिक' (अमृत की वर्षा) होती है।

8. छंद 6 — मेवा चढ़त मिठाई, शुद्ध घ्रत सवाया

मेवा चढ़त मिठाई, शुद्ध घ्रत सवाया!
जगमग जोत जगती, तोरी महमाया ! ॐ जय गिरवर…
अनुवाद: आपके दरबार में विभिन्न प्रकार के उत्तम मेवे, मिठाइयाँ और शुद्ध गाय के घी (घृत) से बने पकवान सवाया (प्रचुर मात्रा में) चढ़ाए जाते हैं। मंदिर के गर्भगृह में आपकी जो अखंड दिव्य ज्योत जगमगा रही है, वह साक्षात आपकी महामाया (दिव्य स्वरूप) का ही प्रकाश है जो संसार के अज्ञान को दूर करता है।
भावार्थ: उग्र रूप के शांत होने के बाद, भक्त माँ के सौम्य रूप की सेवा कर रहे हैं। मंदिर में शुद्ध गाय के घी से बने सवाए पकवान, मेवे और मिठाइयाँ चढ़ाई जा रही हैं। माँ के थान पर जो अखंड ज्योति जल रही है, वह केवल मिट्टी का दीपक नहीं है, बल्कि वह माँ की 'महामाया' (ब्रह्मांडीय ऊर्जा) का साक्षात भौतिक स्वरूप है, जो भक्तों के अंतःकरण के अंधकार को मिटाती है।

9. छंद 7 — दरश दिया दुःख भागे, करज्यों देख दया

दरश दिया दुःख भागे, करज्यों देख दया!
अम्ब कहे नित आनंद, गुण आवड़ गाया! ॐ जय गिरवर…
अनुवाद: माता! आपके मात्र दर्शन करने से ही भक्तों के सारे जन्म-जन्मांतर के दुःख भाग जाते हैं। आप हमेशा अपनी दया दृष्टि हम पर बनाए रखना। कवि 'अम्ब' (या भक्त) कहता है कि जो भी प्राणी नित्य नियम से माँ आवड़ के इन चमत्कारों और गुणों का गान करता है, उसके जीवन में हमेशा परमानंद और सुख-शांति बनी रहती है।
भावार्थ: अंतिम पंक्तियों में कवि पूर्ण शरणागति भाव में आता है। वह कहता है कि माँ, आपके इतिहास और चमत्कारों को केवल सुनने या आपके विग्रह के दर्शन मात्र से ही इंसान के प्रारब्ध के बड़े से बड़े दुख भी कट जाते हैं। बस आप अपनी 'दया दृष्टि' हम पर बनाए रखना। कवि 'अम्ब' घोषणा करता है कि जो भी मनुष्य रोज नियम से माँ आवड़ के इन ऐश्वर्यमयी गुणों का गान करेगा, उसे संसार के किसी कोने में दुख नहीं छू सकेगा, उसका जीवन परमानंद से भर जाएगा।

10. संक्षिप्त भावार्थ और निष्कर्ष

📌 संक्षिप्त भावार्थ:

माँ आवड़ की यह जय गिरवर राया आरती केवल एक स्तुति नहीं है, बल्कि यह जैसलमेर (माड़धरा) के इतिहास, चारण साहित्य और शक्ति मत (Tantric & Shakta Tradition) का एक अद्भुत जीवंत दस्तावेज है। माँ आवड़ को माँ करणी का पूर्व अवतार और जैसलमेर के राजवंश की कुलदेवी (स्वांगिया जी) माना जाता है।

इस Aavad Mata Aarti में वर्णित प्रमुख चमत्कार इस प्रकार हैं:

  • समुद्र सुखाना: सिंध नदी और समुद्र के विशाल जल को अपने उदर में समाहित करना।
  • सूर्य को रोकना: अपनी लोवड़ी से सूर्य देव को ढककर समय रोकना।
  • अमृत लाना: पाताल लोक से पीयूष (अमृत) लाकर भाई मेहराजी को जीवित करना।
  • दैत्य संहार: मरुधरा के दुष्ट राक्षसों का वध कर पहाड़ों की खोह में गाड़ देना।
  • शिला रूप: स्वयं एक चट्टान बनकर मरुधरा की सीमा की रक्षा करना।

🎯 निष्कर्ष — भावार्थ का सार

आवड़ माता की आरती जय गिरवर राया — यह Aavad Mata Aarti Lyrics In Hindi केवल भक्ति गीत नहीं, बल्कि जैसलमेर की गौरवशाली परंपरा, चारण साहित्य और शक्ति उपासना का अमूल्य खजाना है। इस आरती में वर्णित माँ के चमत्कार — चाहे समुद्र सुखाना हो, सूर्य को रोकना हो, या दैत्यों का संहार — हर पंक्ति में माँ की अलौकिक शक्ति का साक्षात्कार होता है।

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11. अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न — आवड़ माता आरती (FAQs)

❓ आवड़ माता कौन हैं?

माँ आवड़ (स्वांगिया जी) को माँ करणी माता से पहले का अवतार माना जाता है। ये मामड़ जी चारण की पुत्री के रूप में जैसलमेर में अवतरित हुईं और जैसलमेर राजवंश की कुलदेवी हैं।

❓ जय गिरवर राया आरती किसने रची?

इस आवड़ माता की आरती के रचयिता कवि 'अम्ब' हैं, जिनका उल्लेख आरती के अंतिम छंद में 'अम्ब कहे नित आनंद' पंक्ति में मिलता है।

❓ आवड़ माता और करणी माता में क्या संबंध है?

माँ आवड़ को माँ करणी का पूर्व अवतार माना जाता है। दोनों ही चारण कुल में जन्मीं और दोनों ने मरुधरा (राजस्थान) की रक्षा की।

❓ आवड़ माता का मंदिर कहाँ स्थित है?

माँ आवड़ का प्रमुख थान (मंदिर) जैसलमेर के तेमड़ी पर्वत और जैसलमेर दुर्ग पर स्थित है, जहाँ ये शिला स्वरूप में विराजमान हैं।

❓ आवड़ माता आरती के पाठ का क्या लाभ है?

Aavad Mata Aarti Lyrics का नियमित पाठ करने से भक्तों के सभी दुःख दूर होते हैं, संकट टलते हैं और माँ की अखंड कृपा प्राप्त होती है।

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🙏 जय आवड़ माता! जय गिरवर राया! 🙏

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