जादौन या जादव वंश की कुलदेवी कैला माता — इतिहास, गोत्र, मंदिर 2026

जादौन या जादव वंश की कुलदेवी कैला माता — इतिहास, गोत्र, मंदिर 2026

जादौन या जादव वंश की कुलदेवी कैला माता — इतिहास, गोत्र, मंदिर 2026

जादौन (जादव) वंश की कुलदेवी श्री कैला माता का पूरा इतिहास। यदुवंश, चंद्रवंश, करौली राज्य, कैला देवी मंदिर, अंजनी माता, रक्तबीज दैत्य वध, गोत्र और वंशावली, योगमाया संबंध, लांगुरिया गीत, दर्शन समय, पहुँचने का रास्ता — सम्पूर्ण जानकारी।

✍️ 📅 प्रकाशित: 🔄 अपडेटेड: ⏱️ पढ़ने का समय: ~18 मिनट

📋 विषय सूची (Table of Contents)

1. जादौन या जादव वंश की कुलदेवी — परिचय

जादौन या जादव वंश की कुलदेवी श्री कैला माता — करौली यदुवंशी राजपूत

हिन्दू धर्म में कुलदेवी माता और कुलदेवता का विशेष महत्व और स्थान होता है। कोई भी धार्मिक कार्य बिना कुलदेवी माता के स्मरण और प्राथना किए बिना आरंभ नहीं होता है। वर्तमान पीढ़ी में हमें हमारी कुलदेवी, कुलदेवता, गोत्र, प्रवर और वंश के बारे में बहुत कम जानकारी है।

कुलदेवी माता की जानकारी के इस चरण में आज हम जादौन या जादव वंश की कुलदेवी जी के बारे में सम्पूर्ण और प्रमाणिक जानकारी प्रस्तुत कर रहे हैं। यदि आप भी जादौन वंश से हैं तो यह लेख आपके लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।

💡 जानें: कुलदेवी क्या होती है और क्यों जरूरी है? — अपनी कुलदेवी को कैसे खोजें, इसकी सम्पूर्ण जानकारी।

2. जादौन वंश का इतिहास — चंद्रवंशी यदुवंश

अत्रि ऋषि के वंशज सोम की संपत्ति (सोमवंशी) चंद्रवंशी कहलाए। इस वंश के छठे (6th) चंद्रवंशी राजा ययाति के पुत्र चंद्रवंशी राजा यदु के वंशज "यदुवंशी" कहलाए। यदुवंश की 39वीं पीढ़ी में श्री कृष्ण हुए और वही श्री कृष्ण से 88वीं पीढ़ी के राजा भाटी अंतिम यदुवंशी शासक हुए।

अन्तिम यदुवंशी शासक से अभिप्राय यह कि राजा भाटी के बाद यदुवंश यादव, भाटी, जाडेजा और चुडासमा उपशाखाओं से जाना गया। यादवों से जादों और फिर जादौन — इस प्रकार यदुवंश में भाटी, जादौन, जाडेजा और चुडासमा राजपूत वंश चले। वर्तमान में करौली (राजस्थान) यदुवंशी जादौन (जादव) राजपूतों की सबसे बड़ी रियासत है, जिसकी स्थापना 13वीं शताब्दी में हुई थी।

करौली के जादौन भगवान श्री कृष्ण की 64वीं पीढ़ी के हैं। करौली जिले में जितने भी जादौन हैं उनकी 52 तड़े (शाखाएँ) हैं। मुख्य तड़े इस प्रकार हैं — गौंजा, पाल, मुकुन्द, रेदास आदि। जाडेजा और चुडासमा की ओर भी दो उपशाखाएँ हैं — सरवैया और रायजादा। चूडासमा, सरवैया और रायजादा ये तीनों एक ही वंश की उपशाखा हैं।

इस लेख में मौजूद जादौन राजपूतों के ठिकाने के अलावा भी पूरे भारत में जादौन राजपूतों के और भी कई ठिकाने हैं। महाराष्ट्र में पाए जानेवाले जाधव मराठा क्षत्रिय भी करौली (राजस्थान) से निकले जादौन राजपूतों की ही एक शाखा हैं। कुछ जगह करौली की स्थापना 15वीं शताब्दी में हुई बताई गयी है।

🏰 चंद्रवंशी राजधानियाँ

चन्द्रवंशी राजाओं (श्रीकृष्ण के वंशज) की अब तक 9 राजधानियाँ जिनमें गजनी भी एक है, के लिए यह दोहा प्रसिद्ध है:

काशी मथुरा प्रयागबड़ गजनी अर भटनेर,
दिगम दिरावल लुद्रवो नौवोँ जैसलमेर।

📿 संबंधित: तंवर (तोमर) वंश की कुलदेवी और इतिहास — चंद्रवंशी राजपूत वंशों की जानकारी।

3. जादौन वंश की घोषणा — गोत्र, वेद, वंशावली

जादौन (जादव) वंश की सम्पूर्ण वंशावली और गोत्र-प्रवर की जानकारी निम्नलिखित है:

विषयविवरण
वंशचन्द्रवंश (यदुवंशी)
कुलयदुवंशी
कुलदेवीश्री कैला माता (राजराजेश्वरी कैला महारानी)
इष्टदेवश्री कृष्ण
वेदयजुर्वेद
गोत्रअत्रि
छत्रमेघाडम्भर
ध्वजभगवा (पीला) रंग
ढोलभंवर
नक्काराअगजीत
गुरुरतन नाथ
पुरोहितपुष्करणा ब्राह्मण
पोलपातरतनु चारण
नदीयमुना
वृक्षपीपल
रागमांड
विरुदउतर भड़ किवाड़ भाटी
प्रणामजय श्री कृष्ण

🚩 पढ़ें: परमार वंश की कुलदेवी श्री सच्चियाय माता — गोत्र और वंशावली की जानकारी।

4. जादौन वंश की कुलदेवी श्री कैला माता

जादौन (जादव) वंश की कुलदेवी श्री कैला माता हैं। राजस्थान के पूर्वी भाग में करौली राज्य यदुवंशी क्षत्रियों की वीर भूमि रही है। करौली राजवंश की कुलदेवी के दो तरह के ऐतिहासिक वृत्तान्त प्राप्त होते हैं।

🛕 अंजनी माता से कैला माता तक

जब यदुवंशी महाराजा अर्जुन देव जी ने 1348 ई. में करौली राज्य की स्थापना की, तभी उन्होंने करौली से उत्तरी दिशा में 2-3 कि.मी. की दूरी पर पांचना नदी के किनारे पहाड़ी पर श्री अंजनी माता का मंदिर बनवाकर अपनी कुलदेवी के रूप में पूजना आरंभ किया। अंजनी माता जादौन राजवंश की प्रथम कुलदेवी के रूप में पूजित हुईं।

एक अन्य ऐतिहासिक वृत्तानुसार, करौली राज्य के दक्षिण-पश्चिम में 23 कि.मी. की दूरी पर चम्बल नदी के पास त्रिकूट पर्वत की मनोरम पहाड़ियों में सिद्धपीठ श्री कैला देवी जी का पावन धाम है। यहाँ प्रतिवर्ष लाखों श्रद्धालु माँ के दर्शनार्थ एकत्रित होते हैं।

📿 संबंधित: हिंगलाज माता मंदिर पाकिस्तान का इतिहास — राजपूत वंशों की आद्यशक्ति।

5. कैला नाम की उत्पत्ति — केलि शब्द, योगमाया और बाबा केदार गिरी

📜 'केलि' शब्द से 'कैला' नाम पड़ने का गहरा रहस्य (Etymology)

स्थानीय इतिहास और प्राचीन मान्यताओं के अनुसार, त्रिकूट पर्वत के घने जंगलों में पहले 'नरकासुर' नाम का एक अत्यंत क्रूर राक्षस रहता था। उसने यहाँ रहने वाले संतों और तपस्वियों का जीना दूभर कर दिया था। तब ऋषियों की पुकार पर आदि-शक्ति माँ भवानी ने यहाँ अवतार लिया और उस राक्षस का वध किया।

संस्कृत में 'केलि' शब्द का अर्थ होता है 'क्रीड़ा' या 'लीला'। चूँकि माता ने दुष्टों का नाश करने के लिए यहाँ एक दिव्य कौतुक या लीला (केलि) रची थी, इसलिए इस क्षेत्र के सिद्ध संतों ने उन्हें 'केलि देवी' नाम दिया। यही शब्द सदियों बाद अपभ्रंश होकर 'कैला देवी' बन गया।

🕉️ द्वापर युग का रहस्य और भगवान कृष्ण से सीधा संबंध (Yogmaya Connection)

यदुवंशी जादौन और जादव राजपूतों का कैला माता को अपनी कुलदेवी मानने के पीछे एक बहुत गहरा रक्त संबंध (Bloodline Connection) है। श्रीमद्भागवत पुराण के अनुसार, कैला माता साक्षात श्री योगमाया (महामाया) का स्वरूप हैं। द्वापर युग में जब कंस ने देवकी के गर्भ से जन्मी आठवीं संतान (जो साक्षात योगमाया थीं) को पत्थर की शिला पर पटक कर मारना चाहा, तो वह कन्या कंस के हाथों से छूटकर आकाश में उड़ गई और अष्टभुजी रूप धारण कर लिया।

यदुवंश से संबंध: चूँकि योगमाया का जन्म यदुवंश के मूल (भगवान कृष्ण के परिवार) में हुआ था, इसलिए वे रिश्ते में यदुवंशियों की सगी कुलरक्षक और बहन स्वरूपा देवी मानी जाती हैं। आकाश मार्ग से जाने के बाद, इसी जाग्रत शक्ति ने करौली के त्रिकूट पर्वत को अपना स्थायी निवास बनाया। इसी कारण जादौन राजपूतों ने उन्हें अपनी सगी कुलदेवी माना है।

🧘 सिद्ध संत बाबा केदार गिरी जी का इतिहास (The Early Origin)

इतिहास के पन्नों को खंगालें तो खींची राजा मुकुन्ददास (विक्रम संवत 1207) से भी बहुत पहले, ईस्वी सन 1114 में इस त्रिकूट पर्वत की कंदराओं में सिद्ध योगी बाबा केदार गिरी जी निवास करते थे। उन्होंने ही इस पहाड़ी पर माता की निराकार ऊर्जा को जाग्रत करने के लिए घोर तपस्या की थी। बाबा केदार गिरी की भक्ति से प्रसन्न होकर ही माता ने उन्हें वचन दिया था कि वे इस पावन पर्वत को छोड़कर कभी कहीं नहीं जाएंगी। राजा मुकुन्ददास ने बाद में उसी स्थान पर पक्का मठ बनवाया था।

🙏 जानें: इन्द्रबाईसा का इतिहास — करणी माता अवतार, खुड़द धाम — योगमाया और शक्ति स्वरूपा देवियों की जानकारी।

6. कैला देवी मंदिर का इतिहास और स्थापना

जिस स्थान पर माँ श्री कैला देवी जी का मंदिर बना है, वह स्थान खींची राजा मुकुन्ददास की रियासत के अधीन था। वे संभवतः चम्बल पार कोटा राज्य की भूमि के स्वामी थे जो गागरोन के किले में रहते थे। उन्होंने बॉसीखेड़ा नामक स्थान पर चामुण्डा देवी की बीजक रूपी मूर्ति स्थापित करवाई थी और वे वहाँ अक्सर आराधना के लिए आते थे। यह बात संवत् 1207 की है।

एक बार खींची राजा मुकुन्ददास जी अपनी रानी सहित चामुण्डा देवी जी के दर्शनार्थ आए। उन्होंने कैला देवी जी की कीर्ति सुनी तो माता के दर्शनार्थ आए। माता के दर्शनों के पश्चात् उनके मन में माता के प्रति अपार श्रद्धा बढ़ गयी। राजा ने देवी जी का पक्का मठ बनवाने का निर्णय लिया और उसी दिन निर्माण शुरू करवा दिया। जब माता का मठ बनकर तैयार हो गया तो श्री कैला देवी जी की प्रतिमा को मठ में विधि-पूर्वक स्थापित करवा दिया।

⚔️ यदुवंशी राजा चन्द्रसेन और गोपाल दास जी

कुछ समय बाद विक्रम संवत् 1506 में यदुवंशी राजा चन्द्रसेन जी ने इस क्षेत्र पर अपना अधिकार कर लिया। उसी समय एक बार यदुवंशी महाराजा चन्द्रसेन जी के पुत्र गोपाल दास जी दौलताबाद के युद्ध में जाने से पूर्व श्री कैला माँ के दर्शनार्थ गए और माता से प्रार्थना की कि यदि इस युद्ध में विजय हुई तो पुनः दर्शन करने आएँगे। जब राजा गोपाल दास जी दौलताबाद के युद्ध में विजय प्राप्त कर लौटे, तब माता जी के दरबार में सब परिवार सहित एकत्रित हुए।

तभी यदुवंशी महाराजा चन्द्रसेन जी ने कैला माँ से प्रार्थना की — "हे कैला माँ, आपकी कृपा से मेरे पुत्र गोपाल दास की युद्ध में विजय हुई है। आज से सभी यदुवंशी राजपूत अंजनी माता जी के साथ-साथ श्री कैला देवी जी को अपनी कुलदेवी (अधिष्ठात्री देवी) के रूप में पूजा किया करेंगे। आज से मैया का पूरा नाम श्री राजराजेश्वरी कैला महारानी जी होगा (बोल सच्चे दरबार की जय)।"

तभी से करौली राजकुल का कोई भी राजा युद्ध में जाए या राजगद्दी पर बैठे, अपनी कुलदेवी श्री कैला देवी जी का आशीर्वाद लेने जरूर जाता है। तभी से मेरी मैया श्री राजराजेश्वरी कैला देवी जी करौली राजकुल की कुलदेवी के रूप में पूजी जा रही हैं।

7. कैला देवी के चमत्कार और मंदिर विशेषताएं

🙏 कैला देवी और चामुण्डा माता

यद्यपि चामुण्डा माता भी महाकाली का ही स्वरूप मानी जाती हैं तथा इनकी वाममार्गी पूजा पद्धति ही अधिक मान्य और प्रचलित है, जबकि कैलादेवी सौम्य स्वरूपा की पूजा पद्धति दक्षिणमार्गी है। माँ चामुण्डा (चामड़) को पहले यहाँ पशु बलि आदि दी जाती थीं तथा वाममार्गी पूजा प्रचलित थी। इसके लिए मंदिर के पिछवाड़े परिसर में ही एक बहुत विशाल बलि कुण्ड (भैंसादह / भैंसा कुड) बना हुआ है, लेकिन बहुत वर्षों से मंदिर में बलि प्रथा बंद है।

🕉️ कैला देवी का झुका हुआ मुख (चेहरा)

यहाँ यह किंवदंती प्रचलित है कि पहले कैलादेवी जी की प्रतिमा का मुख एकदम सीधा था। लेकिन जब बाद में चामुण्डा की प्रतिमा यहाँ स्थापित की गई तो दोनों देवियों में स्वभाव भेद होने के कारण कैला देवी ने चामुण्डा से नाराजगी दिखाते हुए अपना चेहरा विपरीत दिशा में मोड़कर झुका लिया। तब से ही कैलादेवी का सिर एक तरफ को झुका हुआ है।

करौली के जादौन राजवंश के राजा और वंशज, जो पेशे से एडवोकेट हैं, प्रत्येक नवरात्रि की नवमी के दिन यहाँ पूजन करने आते हैं। बताया जाता है कि केवल उसी वक्त ही कुछ समय के लिए पूजनकाल में कैलादेवी का चेहरा सीधा और दृष्टि सीधी हो जाती है।

⚔️ रक्तबीज राक्षस वध की कथा

यहीं पर कैलादेवी में ही माँ महाकाली की रक्तबीज नामक राक्षस से लड़ाई हुई थी। आठ दिन युद्ध चला और नवमी के दिन यानि नौंवें दिन माँ काली को रक्तबीज राक्षस पर विजय प्राप्त हुई। यहीं पर वह काली शिला मौजूद है जहाँ देवी और असुर का संग्राम हुआ। वह शिला भी मौजूद है जिस पर माँ काली और असुर के चरणों के चिह्न छपे हुए हैं। काली शिला पर से ही कालीशिल नामक नदी प्रवाहित होती है। इस नदी में स्नान के बाद ही मंदिर में दर्शन के लिए लोग जाते हैं।

यहाँ भैरव बाबा सहित अनेक पूज्य मंदिर हैं। कैलादेवी मंदिर के सामने ही माँ के एक अनन्य और एकाकार गूजर भगत की प्रतिमा भी मौजूद है।

🚩 विशेष: कैला देवी मंदिर राजस्थान के करौली जिले से 23 कि.मी. दूर चम्बल नदी के किनारे त्रिकूट पर्वत पर स्थित है। नवरात्रि में यहाँ लाखों भक्तों का तांता लगा रहता है।

8. लांगुरिया और गूजर भगत का अटूट इतिहास (The True Folklore)

🎵 गूजर भगत की कथा

कैला देवी मंदिर के ठीक सामने 'गूजर भगत' (जिन्हें लांगुरिया भी कहा जाता है) की एक दिव्य प्रतिमा स्थापित है। लोक मान्यताओं के अनुसार, वे माता के एक अनन्य, निश्छल और परम भक्त थे, जो हर समय माता की सेवा में लीन रहते थे। माता ने उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर उन्हें वरदान दिया था कि जो भी भक्त मेरे दर्शन करने आएगा, वह जब तक तुम्हारे चरणों में शीश नहीं नवाएगा, तब तक उसकी यात्रा और मन्नत अधूरी मानी जाएगी।

🎶 लांगुरिया गीत का महत्व

इसी कारण आज भी उत्तर भारत और राजपूताना में कैला देवी के मेले में जो सुप्रसिद्ध "लांगुरिया गीत" गाए जाते हैं, वे दरअसल माता और उनके इस अनन्य भक्त के पवित्र और सात्विक संबंध के प्रतीक हैं। नवरात्रि के समय पूरा पहाड़ी क्षेत्र "कैला मैया के जयकारों" और लांगुरिया भजनों से गुंजायमान हो उठता है।

9. कैला देवी मंदिर में पूजा विधि और मनोकामना

कैलादेवी पर हर नवरात्रि पर लाखों लोग अटूट रूप से पहुँचते हैं। भारत के सभी राजपूतानों में माँ की काफी अधिक मान्यता है। मंदिर के पीछे ही मनोकामना पूर्ति के लिए लोग उल्टे स्वास्तिक बनाकर जाते हैं और मनोकामना पूर्ति के बाद आकर चाँदी के स्वास्तिक चढ़ाकर स्वास्तिक यानि सांतिया सीधा करते हैं।

जिनके विवाह न हो रहे हों, जिनकी संतान न हो रही हो, पुत्र की कामना हो, दाम्पत्य संबंध बिगड़ गए हों आदि के लिए गोबर (गाय के गोबर) के सांतिये (स्वास्तिक) बनाए जाते हैं। इसी प्रकार अन्य कामनाओं के लिए सिंदूर के सांतिये भैरव बाबा के मंदिर पर (लाट पर या चौकी पर) बनाए जाते हैं, या फिर स्वयं देवी के मंदिर पर ही बना दिए जाते हैं।

अपनी अर्जी माँ के गले में या चरणों में डालने आदि कार्य भी लोग यहाँ करते हैं। मंदिर परिसर के प्रांगण में हवन, धूप, दीप आदि के लिए समुचित व्यवस्था है। रहने-रुकने के लिए अनेक मुफ्त धर्मशालाएँ यहाँ मौजूद हैं। भोग प्रसाद आदि की थाली तैयार कराने, मिलने की समुचित और बेहतरीन व्यवस्था है। खाने-पीने, भोजन, चाय, नाश्ता आदि के लिए भी बहुत सस्ती और उत्तम व्यवस्था मंदिर पर उपलब्ध है।

🙏 पढ़ें: भोग लगाने की आरती — करणी माता आरती Lyrics — राजस्थानी भक्ति परंपरा।

10. कैला देवी दैनिक दर्शन समय सारणी (Kaila Devi Daily Schedule)

कैला देवी मंदिर में माता की सेवा और दर्शन का समय बहुत ही नियमबद्ध है। आम दिनों में समय सारणी इस प्रकार रहती है (त्योहारों और नवरात्रि मेले के दौरान यह समय बढ़ा दिया जाता है):

सेवा / आरतीसमय
सुबह का जागरण व पट खुलनाप्रातः 04:00 बजे
मंगला आरतीप्रातः 04:30 से 05:00 बजे तक
श्रृंगार और भोग (राजभोग)प्रातः 07:00 से 08:00 बजे के बीच
दोपहर विश्राम (पट बंदी)दोपहर 12:00 से 01:00 बजे तक
सांध्य आरती (गोधूलि बेला)शाम 06:30 से 07:15 बजे (मौसम के अनुसार)
शयन आरतीरात्रि 09:30 बजे
पट बंदी (विश्राम)रात्रि 10:00 बजे

💡 नोट: नवरात्रि और विशेष पर्वों के दौरान मंगला आरती और अन्य सेवाएँ रात्रि में भी होती हैं। मेले के समय दर्शन का समय बढ़ाकर 24 घंटे तक कर दिया जाता है।

11. कैला देवी धाम कैसे पहुँचें? (Complete Route Guide)

🚗 सड़क मार्ग द्वारा (By Road — सबसे आसान)

कैला देवी मंदिर करौली शहर से मात्र 27 कि.मी. की दूरी पर स्टेट हाईवे से जुड़ा है। जयपुर (180 कि.मी.), आगरा (190 कि.मी.), दिल्ली (300 कि.मी.) और मथुरा (150 कि.मी.) से करौली के लिए डायरेक्ट बसें चलती हैं। करौली बस स्टैंड से हर 10 मिनट में कैला देवी के लिए ऑटो, जीप और लोकल बसें मिलती हैं।

🚆 रेल मार्ग द्वारा (By Train)

कैला देवी का अपना कोई रेलवे स्टेशन नहीं है। सबसे नजदीकी रेलवे स्टेशन हिंडौन सिटी (Hindaun City — रेलवे कोड: HAN) और गंगापुर सिटी (Gangapur City — रेलवे कोड: GGC) हैं। ये दोनों स्टेशन दिल्ली-मुंबई मुख्य रेल मार्ग पर स्थित हैं और भारत के सभी बड़े शहरों से जुड़े हैं। यहाँ उतरकर आप मात्र 40-50 मिनट में टैक्सी या बस द्वारा सीधे मंदिर पहुँच सकते हैं।

✈️ हवाई मार्ग द्वारा (By Air)

सबसे पास का हवाई अड्डा जयपुर इंटरनेशनल एयरपोर्ट (JAI) है। एयरपोर्ट से आप डायरेक्ट टैक्सी रेंट पर लेकर वाया दोसा-गंगापुर होते हुए करीब 3.5 से 4 घंटे में कैला देवी पहुँच सकते हैं।

🚩 सबसे अच्छा समय: दर्शन के लिए अक्टूबर से मार्च का समय सबसे उत्तम है। यदि आप सांस्कृतिक और धार्मिक रंग देखना चाहते हैं, तो मार्च-अप्रैल में आने वाले चैत्र नवरात्रि मेले के दौरान आना सर्वश्रेष्ठ रहेगा।

12. आस-पास के मुख्य दार्शनिक स्थल (Nearby Attractions)

यदि आप कैला देवी आ रहे हैं, तो इन पवित्र और ऐतिहासिक स्थानों के दर्शन किए बिना आपकी यात्रा अधूरी मानी जाएगी:

  1. अंजनी माता मंदिर: करौली शहर के पास पांचना नदी के किनारे स्थित जादौन वंश की आदि कुलदेवी का जाग्रत स्थान। मान्यता है कि यहाँ हनुमान जी की माता अंजनी की मूर्ति स्थापित है, जिसमें वे हनुमान जी को स्तनपान करा रही हैं।
  2. मदन मोहन जी मंदिर (करौली): करौली के राजमहल परिसर में स्थित राधा-कृष्ण का अत्यंत भव्य और जाग्रत मंदिर। जयपुर के गोविंददेवजी मंदिर की तरह जादौन राजवंश मदन मोहन जी को अपना मुख्य 'इष्टदेव' मानता है।
  3. करौली सिटी पैलेस (राजमहल): 14वीं शताब्दी का शानदार राजपूत स्थापत्य कला का बेजोड़ नमूना। इसमें की गई बारीक नक्काशी, जालीदार खिड़कियाँ और कांच का काम सैलानियों को मंत्रमुग्ध कर देता है।
  4. तिमनगढ़ किला: करौली के जंगलों में स्थित यदुवंशियों का प्राचीन और सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण किला। यह अपनी प्राचीन मूर्तियों और रहस्यमयी वास्तुकला के लिए प्रसिद्ध है।

13. जादौन वंश का विस्तृत इतिहास और विस्तार

🏰 करौली की स्थापना और "कल्याणपुरी" का प्राचीन रहस्य

यदुवंश के प्रतापी राजाओं की वीर भूमि करौली का इतिहास स्वर्णिम अक्षरों में लिखा गया है। ईस्वी सन 1348 (विक्रम संवत 1405) में यदुवंशी राजपूत राजा महाराजा अर्जुन पाल (Arjun Pal) ने करौली राज्य की नींव रखी थी।

बहुत कम लोग जानते हैं कि स्थापना के समय इस पावन नगर का नाम करौली नहीं, बल्कि "कल्याणपुरी" (Kalyanpuri) था। राजा अर्जुन पाल ने यहाँ के स्थानीय जाग्रत देवता श्री कल्याणजी (भगवान विष्णु के अवतार) के प्रति अगाध श्रद्धा प्रकट करते हुए इस सुंदर नगर का नामकरण उनके नाम पर किया था। समय के साथ 'कल्याणपुरी' शब्द जनभाषा के प्रभाव से अपभ्रंश होकर 'करौली' के रूप में प्रसिद्ध हुआ। राजा अर्जुन पाल ने ही सुरक्षा चक्र को मजबूत करने के लिए पांचना नदी के तट पर आदि कुलदेवी अंजनी माता का मंदिर बनवाया था।

⚔️ बयाना के राजा विजय पाल (11वीं सदी) और जादौन वंश का विस्तार

यदुवंश के इतिहास में 11वीं शताब्दी के शासक महाराजा विजय पाल (Raja Vijay Pal of Bayana) का नाम स्वर्ण अक्षरों में दर्ज है। महाराजा विजय पाल भगवान श्री कृष्ण की सीधी वंशावली में 88वें वंशज माने जाते हैं। उन्होंने भरतपुर के पास स्थित ऐतिहासिक बयाना दुर्ग (विजय मंदिर गढ़) का निर्माण करवाया था और इसे यदुवंशियों का एक बेहद शक्तिशाली केंद्र बनाया था।

11वीं सदी में तुर्कों के आक्रमण और बयाना के पतन के बाद, राजा विजय पाल के वंशज और प्रतापी पुत्र (जैसे तिमनपाल, जिन्होंने तिमनगढ़ किला बनवाया) अलग-अलग दिशाओं में फैल गए। इस प्रकार जादौन और जादव राजपूतों का विस्तार पूरे भारत में हुआ:

  • उत्तर प्रदेश (UP): आगरा, मथुरा, अलीगढ़, एटा, मैनपुरी, फिरोजाबाद और बुलंदशहर के क्षेत्रों में जादौन राजपूतो की भारी आबादी बसी।
  • राजस्थान (Rajasthan): करौली मुख्य रियासत बनी। इसके अलावा भरतपुर, धौलपुर, और अलवर के क्षेत्रों में जादौन वंश का प्रभाव फैला।
  • हरियाणा (Haryana): पलवल, नूंह और फरीदाबाद के इलाकों में यदुवंशी शाखाएं स्थापित हुईं।
  • मध्य प्रदेश (MP): मुरैना, भिंड, ग्वालियर और चंबल संभाग के इलाकों में जादौन राजपूतों ने अपने नए ठिकाने और जागीरें बनाईं।

14. गोत्र और उप-शाखाएं (Sub-Clans)

🔥 अत्रि गोत्र (Main Gotra)

समस्त जादौन, जादव और यदुवंशी राजपूतों का मूल और मुख्य गोत्र अत्रि (Atri Gotra) है। चंद्रवंश के आदि पुरुष बुध के पिता चंद्रमा स्वयं महर्षि अत्रि के पुत्र थे, इसलिए इस वंश का गोत्र अत्रि है। इनका प्रवर 'अत्रि, अर्चनानस, श्यावाश्व' है और इनका प्राचीन वेद यजुर्वेद है।

⚔️ उप-शाखाओं (Sub-Clans) की विस्तृत सूची

समय, स्थान और राजाओं के नाम के आधार पर जादौन/यदुवंश आगे चलकर कई पराक्रमी उप-शाखाओं में विभाजित हुआ:

  • छोंकर (Chhonkar): जादौन वंश की यह एक बेहद वीर और प्रभावशाली उप-शाखा है। मुख्य रूप से हरियाणा (नूंह, पलवल) और UP (जेवर, बुलंदशहर) में निवास करती है।
  • भाटी (Bhati): राजा भाटी के वंशज जिन्होंने जैसलमेर रियासत की स्थापना की।
  • जाडेजा (Jadeja): गुजरात और कच्छ के शासक, जो स्वयं को श्री कृष्ण का वंशज मानते हैं।
  • चुडासमा (Chudasama): जूनागढ़ और गुजरात के यदुवंशी शासक।
  • सरवैया और रायजादा: चुडासमा वंश की ही प्रतिष्ठित उप-शाखाएं।

💡 पढ़ें: कछवाहा वंश की कुलदेवी — इतिहास व मंदिर — सूर्यवंशी राजपूत वंश की जानकारी।

15. इतिहास के प्रसिद्ध जादौन (यदुवंशी) राजा

करौली और बयाना के यदुवंशी इतिहास को अमर बनाने वाले कुछ महानतम शासकों की सूची इस प्रकार है:

  1. महाराजा यदु: चंद्रवंश के प्रतापी राजा, जिनके नाम पर पूरे 'यदुवंश' की स्थापना हुई।
  2. भगवान श्री कृष्ण: यदुवंश की 39वीं पीढ़ी के महापुरुष, जिन्हें जादौन राजवंश अपना मूल पुरुष और इष्टदेव मानता है।
  3. महाराजा भाटी: यदुवंश की 88वीं पीढ़ी के अंतिम एकीकृत शासक, जिनके बाद यदुवंश की उप-शाखाएं अलग-अलग राज्यों में फैलीं।
  4. महाराजा विजय पाल (11वीं सदी): बयाना (विजय मंदिर गढ़) के प्रतापी राजा, जिन्होंने तुर्कों के खिलाफ भयंकर युद्ध लड़े और उत्तर भारत में यदुवंशियों का साम्राज्य फैलाया।
  5. महाराजा तिमन पाल: राजा विजय पाल के पुत्र, जिन्होंने विशाल 'तिमनगढ़ किले' का निर्माण करवाया और जादौन सत्ता को सुदृढ़ किया।
  6. महाराजा अर्जुन पाल (1348 AD): करौली रियासत के महान संस्थापक, जिन्होंने "कल्याणपुरी" नगर बसाया और आदि कुलदेवी अंजनी माता के मंदिर का निर्माण करवाया।
  7. महाराजा गोपाल दास जी (15वीं-16वीं सदी): दौलताबाद के ऐतिहासिक युद्ध को जीतने वाले महान वीर शासक, जिन्होंने श्री कैला देवी को सपरिवार राजवंश की प्रधान कुलदेवी स्वीकार किया और मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया।

16. जादौन वंश के विवाह और गोत्र के नियम

क्षत्रिय राजपूत परंपरा के अनुसार जादौन (जादव) समाज में विवाह को लेकर कुछ बहुत ही कड़े और वैज्ञानिक नियम बनाए गए हैं, ताकि कुल की शुद्धता और वंश परंपरा बनी रहे:

🚫 सगोत्र विवाह पूरी तरह वर्जित

जादौन राजपूतों का मूल गोत्र 'अत्रि' है। सनातन धर्म के नियमों के अनुसार, एक ही गोत्र में जन्म लेने वाले लड़का-लड़की आपस में भाई-बहन माने जाते हैं। इसलिए अत्रि गोत्र के भीतर (यानी जादौन का जादौन से) विवाह पूरी तरह वर्जित है।

📜 चार गोत्र टालने का नियम

जादौन समाज में शादी तय करते समय मुख्य रूप से 3 या 4 कुलों/गोत्रों को पूरी तरह टाला जाता है — (1) स्वयं का कुल (पिता का जादौन कुल), (2) माता का पीहर (ननिहाल का कुल), (3) दादी का पीहर, और (4) कई परिवारों में नानी का पीहर भी टाला जाता है।

⚔️ उप-शाखाओं में विवाह का नियम

जादौन राजपूतों की ही उप-शाखाएं जैसे भाटी, जाडेजा, चुडासमा और छोंकर हैं। चूंकि ये सभी मूल रूप से यदुवंश और अत्रि गोत्र से ही निकले हैं, इसलिए प्राचीन परंपराओं के अनुसार इनका आपस में विवाह भी वर्जित माना जाता है। जादौन राजपूतों का विवाह अन्य सूर्यवंशी या अग्निवंशी राजपूत कुलों (जैसे कछवाहा, राठौड़, परमार, चौहान, तोमर आदि) में तय किया जाता है।

17. भौगोलिक फैलाव की जानकारी (Jadon Rajput Distribution Map)

जादौन और जादव राजपूतों का भौगोलिक फैलाव (Distribution) पूरे भारत में बहुत ही व्यापक रहा है। यदि हम इसका एक mental मानचित्र (Map Info) तैयार करें, तो इनके मुख्य क्षेत्र निम्नलिखित हैं:

  • पूर्वी राजस्थान (The Core Belt): करौली इनका मुख्य गढ़ और रियासत रही है। इसके अलावा धौलपुर, भरतपुर, अलवर और जयपुर के ग्रामीण क्षेत्रों में जादौन राजपूतो की बहुत घनी आबादी निवास करती है।
  • पश्चिमी उत्तर प्रदेश (The Braj & Yamuna Belt): यमुना नदी के किनारे-किनारे आगरा, मथुरा, अलीगढ़, एटा, मैनपुरी, फिरोजाबाद, महामायानगर (हाथरास) और बुलंदशहर के जिलों में जादौन राजपूतों के सैकड़ों ऐतिहासिक गाँव और जागीरें फैली हुई हैं।
  • हरियाणा और दिल्ली NCR: फरीदाबाद, पलवल और नूंह (मेवात) के इलाकों में जादौन राजवंश की 'छोंकर' उप-शाखा के कई बड़े ठिकाने और गाँव मौजूद हैं, जो मुख्यतः हरियाणा के नूंह, पलवल और उत्तर प्रदेश के जेवर (Jewar) तहसील में मिलते हैं।
  • मध्य प्रदेश (The Chambal Belt): राजस्थान बॉर्डर से सटे चंबल संभाग के मुरैना, भिंड, श्योपुर और ग्वालियर के क्षेत्रों में जादौन राजपूतो का बहुत बड़ा सामाजिक और ऐतिहासिक प्रभाव है।
  • महाराष्ट्र (The Maratha Yadav Belt): महाराष्ट्र के Satara, कोल्हापुर, पुणे और विदर्भ क्षेत्रों में पाए जाने वाले वीर 'जाधव' क्षत्रिय भी इसी जादौन राजवंश का भौगोलिक फैलाव हैं।

18. अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न — जादौन वंश की कुलदेवी (FAQs)

❓ जादौन या जादव वंश की कुलदेवी कौन हैं?

जादौन (जादव) वंश की कुलदेवी श्री कैला माता (राजराजेश्वरी कैला महारानी) हैं। करौली राज्य के स्थापना के समय से ही यदुवंशी जादौन राजपूत कैला देवी को अपनी अधिष्ठात्री कुलदेवी के रूप में पूजते आ रहे हैं। साथ ही श्री अंजनी माता को भी जादौन वंश की आदि कुलदेवी के रूप में पूजा जाता है।

❓ कैला देवी मंदिर कहाँ स्थित है?

श्री कैला देवी मंदिर राजस्थान के करौली जिले से लगभग 23-27 किलोमीटर दूर चम्बल नदी के पास त्रिकूट पर्वत की मनोरम घाटी में स्थित है। यह सिद्धपीठ पूर्वी राजस्थान का प्रसिद्ध शक्तिपीठ है।

❓ जादौन राजपूत मुख्य रूप से कहाँ पाए जाते हैं?

जादौन राजपूत मुख्य रूप से राजस्थान (करौली, धौलपुर, भरतपुर), उत्तर प्रदेश (आगरा, अलीगढ़, मथुरा, फिरोजाबाद, बुलंदशहर), हरियाणा (पलवल, नूंह) और मध्य प्रदेश के चंबल संभाग में पाए जाते हैं। महाराष्ट्र के **जाधव क्षत्रिय** भी इसी वंश की एक शाखा हैं।

❓ कैला माता और भगवान श्री कृष्ण का क्या संबंध है?

पौराणिक ग्रंथों के अनुसार, कैला माता साक्षात श्री योगमाया (महामाया) का अवतार हैं। द्वापर युग में उन्होंने कंस के कारागार में माता देवकी की आठवीं संतान (भगवान कृष्ण के समानांतर) के रूप में जन्म लिया था। यदुवंश के मूल परिवार में प्रकट होने के कारण जादौन राजपूत इन्हें अपनी कुलरक्षक बहन के रूप में पूजते हैं।

❓ कैला देवी मंदिर में उल्टा स्वास्तिक क्यों बनाया जाता है?

कैला देवी धाम में एक प्राचीन मान्यता है कि यदि कोई भक्त अपनी कोई विशेष कठिन मनोकामना (जैसे विवाह में बाधा, संतान सुख, या व्यापार में घाटा) लेकर आता है, तो वह मंदिर के पीछे की दीवार पर गाय के गोबर या सिंदूर से उल्टा स्वास्तिक (सांतिया) बनाकर अपनी अर्जी लगाता है। मन्नत पूरी होने के बाद सीधा स्वास्तिक चढ़ाया जाता है।

❓ कैला देवी की प्रतिमा का मुख एक तरफ झुका हुआ क्यों है?

कैला देवी सौम्य स्वरूपा की दक्षिणमार्गी पूजा पद्धति की देवी हैं, जबकि चामुण्डा माता वाममार्गी पूजा पद्धति की देवी मानी जाती हैं। किंवदंती के अनुसार गर्भगृह में चामुण्डा की प्रतिमा स्थापित होने पर कैला देवी ने नाराजगी में अपना चेहरा विपरीत दिशा में मोड़ लिया, जो आज भी झुका हुआ है।

❓ जादौन वंश का गोत्र और वेद क्या है?

जादौन वंश का गोत्र अत्रि, वंश चंद्रवंश (यदुवंशी), वेद यजुर्वेद, कुलदेवी कैला माता, इष्टदेव श्री कृष्ण, छत्र मेघाडम्भर, ध्वज भगवा (पीला) रंग, वृक्ष पीपल और नदी यमुना मानी जाती है।

❓ क्या जादौन राजपूतों की दो कुलदेवियां हैं?

हाँ, करौली के जादौन (जादव) राजवंश के इतिहास में दो माताओं का उल्लेख मिलता है। जब महाराजा अर्जुन देव ने 1348 ई. में करौली की स्थापना की, तब उन्होंने पांचना नदी के किनारे श्री अंजनी माता का मंदिर बनवाकर उन्हें कुलदेवी के रूप में पूजा। बाद में, महाराजा चंद्रसेन और गोपाल दास जी के समय दौलताबाद युद्ध में विजय प्राप्त करने के बाद, पूरे राजवंश ने त्रिकूट पर्वत की जाग्रत शक्ति श्री कैला देवी को अपनी प्रधान अधिष्ठात्री कुलदेवी (राजराजेश्वरी) के रूप में स्वीकार किया। इसलिए जादौन समाज में ये दोनों ही देवियां कुलदेवी के रूप में समान रूप से पूजनीय हैं।

❓ जादौन वंश का इतिहास क्या है?

जादौन वंश चंद्रवंशी यदुवंश की शाखा है। श्री कृष्ण से 88वीं पीढ़ी के राजा भाटी अंतिम यदुवंशी शासक हुए। करौली रियासत की स्थापना 1348 ई. में महाराजा अर्जुन देव जी ने की थी। ये भगवान श्री कृष्ण की 64वीं पीढ़ी के वंशज माने जाते हैं।

❓ कैला देवी मंदिर का निर्माण किसने करवाया?

प्रारंभ में खींची राजा मुकुन्ददास ने विक्रम संवत् 1207 में चामुण्डा देवी की मूर्ति स्थापित करवाई। बाद में विक्रम संवत् 1506 में यदुवंशी राजा चन्द्रसेन जी ने इस क्षेत्र पर अधिकार किया और तब से कैला देवी जादौन राजकुल की कुलदेवी बनीं।

❓ कैला देवी और चामुण्डा माता में क्या संबंध है?

कैला देवी सौम्य स्वरूपा की दक्षिणमार्गी पूजा पद्धति की देवी हैं, जबकि चामुण्डा (चामड़) माता वाममार्गी पूजा पद्धति की देवी मानी जाती हैं। किंवदंती के अनुसार चामुण्डा की प्रतिमा स्थापित होने पर कैला देवी ने नाराजगी में अपना चेहरा विपरीत दिशा में मोड़ लिया, जो आज भी झुका हुआ है।

❓ काली सिल नदी का क्या महत्व है?

कैला देवी मंदिर के समीप बहने वाली नदी को 'काली सिल' कहा जाता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, इसी नदी के तट पर स्थित 'काली शिला' पर माँ महाकाली और राक्षस रक्तबीज के बीच 8 दिनों तक भयानक युद्ध हुआ था। इस नदी का पानी अत्यंत पवित्र और औषधीय गुणों से भरपूर माना जाता है। परंपरा के अनुसार, हर श्रद्धालु मंदिर में दर्शन करने से पूर्व इस नदी में स्नान अवश्य करता है।

❓ कैला देवी मंदिर दर्शन के लिए कब जाएं और पूजा कैसे करें?

दर्शन के लिए अक्टूबर से मार्च का समय सबसे उत्तम है। पूजा करने की सात्विक विधि यह है कि सबसे पहले पवित्र काली सिल नदी में स्नान या आचमन करें। इसके बाद मंदिर परिसर में प्रवेश कर माता को नारियल, चुनरी, लापसी का भोग और कपूर की आरती अर्पित करें। मनोकामना पूर्ति के लिए मंदिर के पीछे उल्टा स्वास्तिक बनाने की विशेष परंपरा है।

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