तौमर तंवर वंश की कुलदेवी और इतिहास — Tanwar Vansh Ki Kuldevi Or History
तौमर तंवर वंश की कुलदेवी श्री चिलाय माता (योगमाया) का पूरा इतिहास। चंद्रवंशी पांडव वंशज, दिल्ली अनंगपाल, ग्वालियर, पाटन मंदिर, अरावली पर्वत, गोत्र, वंशावली, दर्शन समय — सम्पूर्ण जानकारी।
📋 विषय सूची (Table of Contents)
- 👉 1. तौमर तंवर वंश की कुलदेवी — परिचय
- 👉 2. तंवर वंश का इतिहास — चंद्रवंशी पांडव वंशज
- 👉 3. पांडवों और योगमाया का संबंध
- 👉 4. महाराजा अनंगपाल तौमर और दिल्ली का योगमाया मंदिर
- 👉 5. तंवर वंश की घोषणा — गोत्र, वेद, वंशावली
- 👉 6. तंवर वंश की कुलदेवी श्री चिलाय माता
- 👉 7. पाटन चिलाय माता मंदिर — अरावली पर्वत
- 👉 8. चिलाय नाम का रहस्य — चील रूप धारण
- 👉 9. ग्वालियर और एसाहगढ़ के तंवर
- 👉 10. तोरावटी और सारंग (सारूड) माता
- 👉 11. तंवर वंश की उप-शाखाएं और विस्तार
- 👉 12. इतिहास के प्रसिद्ध तंवर शासक
- 👉 13. दर्शन, पूजा विधि और मेला
- 👉 14. पाटन मंदिर कैसे पहुँचें? (Complete Route Guide)
- 👉 15. अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
1. तौमर तंवर वंश की कुलदेवी — परिचय
इंटरनेट खंगाल कर देख लीजिए, अपनी कुलदेवी और गोत्र के बारे में सही और सटीक बातें मिलना आज के समय में टेढ़ी खीर बन चुका है। जो थोड़ी-बहुत जानकारियां हैं भी, वे इतनी उलझी हुई हैं कि हमारी आज की पीढ़ी समझ ही नहीं पाती। जब हमारी टीम ने तंवर (तोमर) राजपूत वंश के इतिहास और उनकी कुलदेवी चिल्लाय माता पर रिसर्च शुरू की, तो समझ आया कि असली इतिहास तो बुजुर्गों की कहानियों और भाटों की पुरानी बहियों में बिखरा पड़ा है।
यह एक छोटा सा प्रयास है उसी बिखरे हुए गौरवशाली इतिहास को समेटकर आपके सामने रखने का। तंवर या तोमर वंश कोई छोटा-मोटा नाम नहीं है, यह चंद्रवंशी क्षत्रियों का वो स्तंभ है जिसने सदियों तक दिल्लीपति बनकर भारत की तकदीर लिखी है। आइए, आज इस वंश की जड़ों को और उनकी रक्षक चिल्लाय माता के चमत्कारों को करीब से महसूस करते हैं।
💡 काम की बात: अगर आपको अपनी कुलदेवी ढूंढने में दिक्कत आ रही है, तो हमारा यह लेख आपकी मदद कर सकता है: कुलदेवी क्या होती है और क्यों जरूरी है? — यहाँ आपको अपनी कुलदेवी खोजने का सही तरीका मिलेगा।
2. तंवर वंश का इतिहास — चंद्रवंशी पांडव वंशज
जब हम इतिहास के पन्ने पलटते हैं, तो क्षत्रिय समाज मुख्य रूप से चार बड़े हिस्सों में बंटा हुआ दिखता है — सूर्यवंश, चंद्रवंश, ऋषिवंश और अग्निवंश। इसमें जो चंद्रवंश की कढ़ी है, उसी में कुरुक्षेत्र के राजाओं का जन्म हुआ, जिन्हें हम कौरव and पांडव के नाम से जानते हैं। महाभारत के उस भीषण युद्ध के बाद जो पांडव बचे, उन्हीं के सीधे वंशज आगे चलकर तौमर या तंवर कहलाए। जो लोग संस्कृत के ग्रंथ पढ़ते हैं, वे जानते हैं कि वहां 'तंवर' को मूल रूप से 'तौमर' लिखा जाता है।
Pandavs ने हस्तिनापुर और इन्द्रप्रस्थ को अपनी आन-बान का केंद्र बनाया था। जब युद्ध का समय आया या राजकाज चलाने की बात हुई, तो उन्होंने भगवान श्री कृष्ण के कहे अनुसार अपनी कुलदेवी योगमाया को अपनी राजधानी में स्थापित किया था। वो जगह आज भी दिल्ली की धड़कन बनकर वैसी ही मौजूद है।
📜 तंवर वंश का प्राचीन दोहा
तू संगती तंवरा तणी चावी मात चिलाय ।
म्हैर करी अत मात थूं दिल्ली राज दिलाय ।।
हमारे बुजुर्गों के बीच यह दोहा आज भी बहुत चाव से दोहराया जाता है। इसका सीधा सा मतलब यही है कि माँ चिलाय की असीम मेहरबानी से ही तंवरों को दिल्ली का राजपाट नसीब हुआ था।
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3. पांडवों और योगमाया का संबंध — महाभारत काल से
महाभारत काल की वो बात तो आपको याद ही होगी जब पांडवों को अपना भेष बदलकर एक साल का अज्ञातवास काटना पड़ा था। वे मत्स्य देश की भूमि यानी इसी विराटनगर (जिसे आज हम पाटन काका इलाका कहते हैं) में आकर छुपे थे। स्थानीय लोगों और लोक-कथाओं की मानें तो विराटनगर जाने से ठीक पहले पांडवों ने अरावली की इन कंदराओं में रुककर भगवान कृष्ण के मार्गदर्शन में माँ योगमाया की गुप्त पूजा की थी और मंदिर की नींव रखी थी।
Yogmaya साक्षात वही जाग्रत शक्ति हैं जिन्होंने द्वापर युग में कंस के कारागार में देवकी के गर्भ से जन्म लिया था और कंस के हाथ से छूटकर आसमान में कड़क उठी थीं। चूंकि उनका जन्म यदुवंश के मूल परिवार में हुआ था, इसलिए पांडवों से उनका गहरा रिश्ता था। यही वजह है कि जब पांडवों ने इन्द्रप्रस्थ बसाया, तो योगमाया को ही अपनी कुलरक्षक देवी मानकर स्थापित किया। यही शक्ति आगे चलकर अलग-अलग ठिकानों पर योगेश्वरी, सारूंड माता और चिलाय माता के नाम से प्रसिद्ध हुई।
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4. महाराजा अनंगपाल तौमर और दिल्ली का योगमाया मंदिर
वक्त का पहिया घूमा और पांडवों की इसी पीढ़ी में आगे चलकर आठवीं सदी में राजा अनंगपाल तोमर प्रथम का उदय हुआ। उन्होंने वीरान हो चुकी इन्द्रप्रस्थ की जगह 'ढिल्लिका' (दिल्ली) नगरी बसाई और वहां लाल कोट का किला खड़ा किया। राजा अनंगपाल तोमर अपनी कुलदेवी के परम भक्त थे। उन्होंने महरौली के उस प्राचीन पांडव कालीन मंदिर का बड़े स्तर पर जीर्णोद्धार कराया।
माँ योगमाया के इस जाग्रत स्थान की वजह से ही उस दौर में दिल्ली को लोग 'योगिनीपुरी' के नाम से पुकारते थे। मंदिर के ठीक पास राजा ने 'अनंगपाल तालाब' भी बनवाया था, जिसे देखने आज भी लोग दूर-दूर से आते हैं। यह जगह आज भी श्रद्धालुओं के लिए अटूट आस्था का बड़ा केंद्र बनी हुई है।
🏛️ दिल्ली के अंतिम तौमर शासक और ग्वालियर की स्थापना
जब दिल्ली में सियासी हालात बदले और तोमर राजपूतों की मुख्य गद्दी वहां से हटी, तो अंतिम राजा तेजमाल जी की मृत्यु के बाद उनके बेटे अचलब्रह्म ने ग्वालियर के पास 'एसाहगढ़' में अपना नया ठिकाना बनाया। यह वही एसाहगढ़ है जहाँ से इस वंश की पुरानी यादें जुड़ी थीं। तोमरों ने अपनी इस नई रियासत में भी माँ कुलदेवी का मंदिर स्थापित किया, जो आज भी वहां के लोगों की आस्था का सबसे बड़ा केंद्र है और गोपांचलगढ़ (ग्वालियर) के तोमर भाई आज भी वहां बड़े चाव से ढोक लगाने जाते हैं।
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5. तंवर वंश की घोषणा — गोत्र, वेद, वंशावली
अगर आप तंवर या तोमर वंश से हैं, तो बुजुर्गों के अनुसार आपके कुल की जो पारंपरिक पहचान और निशानियां हैं, उन्हें यहाँ एक सीधे-सादे ढंग से दिया गया है ताकि आपको याद रखने में आसानी हो:
| कुल की पहचान | विवरण |
|---|---|
| मूल वंश | चंद्रवंश (चक्रवर्ती पांडव वंश) |
| कुलदेवी | श्री चिलाय माता (योगमाया / योगेश्वरी / सारंग देवी) |
| मुख्य गोत्र | अत्रि, व्यागर, गागर्य |
| कुल प्रवर | गागर्य, कौस्तुभ, माडषय |
| वेद | यजुर्वेद |
| इष्टदेव | भगवान भोलेनाथ (शिव जी) |
| कुल गुरु | भगवान सूर्य नारायण |
| भैरव बाबा | गौरा भैरव |
| कुल वृक्ष (पेड़) | गूलर का पेड़ |
| राजकीय झंडा | पंचरंगा |
| कुल का निशान | चील पक्षी (कपि) और आधा चंद्रमा |
| ढोल और नगारा | भंवर ढोल — रणजीत, जय, विजय, अजय नगारा |
| मूल निकास | ऐतिहासिक हस्तिनापुर |
| प्रमुख राजगादी | इन्द्रप्रस्थ (दिल्ली) |
| पारंपरिक पुरोहित | भिवाल ब्राह्मण |
| पारंपरिक प्रणाम | जय गोपाल |
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6. तंवर वंश की कुलदेवी श्री चिलाय माता
सरल शब्दों में कहें तो तंवर (तोमर) राजपूतों के परिवार जैसे-जैसे अलग-अलग राज्यों में फैलते गए, वहाँ माता के नाम स्थानीय भाषा के रंग में ढल गए। अगर आप दिल्ली या ग्वालियर के पुराने तोमर परिवारों से मिलेंगे, तो वे माता को 'योगमाया' या 'योगेश्वरी' ही कहेंगे।
वहीं, राजस्थान के शेखावाटी, बीकानेर और जोधपुर के इलाकों में इन्हें पूरी श्रद्धा से 'चिलाय माता' या 'चिल्लाय माता' के नाम से पूजा जाता है। इसके अलावा, जो तोरावटी (पाटन) क्षेत्र के तंवर हैं, उनके लिए माँ का मुख्य स्थान सारूंड गाँव की पहाड़ी पर है, इसलिए वे बड़े चाव से इन्हें 'सारंग देवी' या 'सारूंड माता' बुलाते हैं। नाम भले ही अलग हों, लेकिन सबके दिलों में माँ के लिए आस्था वही पुरानी है।
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7. पाटन चिलाय माता मंदिर — अरावली पर्वत पर दिव्य धाम
अगर आप कभी जयपुर-दिल्ली हाईवे से जा रहे हों, तो कोटपुतली से नीमकाथाना वाले रास्ते पर मुड़ जाइए। वहां से करीब 7 किलोमीटर आगे बढ़ते ही अरावली की सुंदर पहाड़ियों के बीच एक गाँव आता है — सारूंड। इसी पहाड़ी की ऊँची चोटी पर चिलाय माता का बेहद भव्य मंदिर बना हुआ है। पाटन के राजा राव भोपाजी तंवर ने इस मंदिर का पक्का निर्माण करवाया था।
यह वही पवित्र अरावली पर्वत श्रृंखला का इलाका है जहाँ कभी पांडवों के कदम पड़े थे। आज ग्राउंड रियलिटी यह है कि चैत्र और आश्विन नवरात्रि में यहाँ पैर रखने की जगह नहीं मिलती, दूर-दूर से तंवर भाई अपनी नई गाड़ियों की पूजा करवाने और अपने नवविवाहित बच्चों का 'गठजोड़' खोलने यहाँ खिंचे चले आते हैं। पहाड़ियों का वो माहौल और माता के जयकारे दिल खुश कर देते हैं।
🛕 मंदिर का माहौल और मान्यता
पहाड़ी की चोटी पर बने होने के कारण यहाँ की शांति और हवा में एक अलग ही शक्ति महसूस होती है। मंदिर परिसर के पास ही एक प्राचीन कुंड है जिसे लोग मानसरोवर के नाम से जानते हैं। स्थानीय लोगों का मानना है कि इस कुंड के पानी में आज भी औषधीय गुण हैं और यहाँ मन्नत मांगने से हर दुख दूर हो जाता है।
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8. चिलाय नाम का रहस्य — चील रूप धारण की कथा
अब आपके मन में भी यह सवाल उठ रहा होगा कि माँ योगमाया का नाम यह 'चिलाय माता' कैसे हो गया? इसके पीछे की कहानी बड़ी ही भावुक और रोंगटे खड़े कर देने वाली है, जो पाटन के बुजुर्ग आज भी सुनाते हैं। यह प्रसंग तंवरों की एक वीर उपशाखा 'जाटू राजपूतों' के समय का है।
हुआ यह था कि तंवर राजा राव धोतजी के छोटे बेटे जयरथजी (जाटू सिंह जी) जब बिल्कुल छोटे बालक थे, तब उनके ठिकाने पर दुश्मनों ने अचानक धावा बोल दिया। बालक जयरथजी को बचाने के लिए जब सैनिक भाग रहे थे, तो दुश्मनों ने उन्हें चारों ओर से घेर लिया। उस विकट परिस्थिति में कोई रास्ता नहीं बचा था।
तभी अचानक आसमान से एक बहुत विशाल चील पक्षी तेजी से नीचे उतरी। वह कोई साधारण पक्षी नहीं, बल्कि खुद तंवर कुल की रक्षक माँ योगमाया थीं। माता ने उस चील के रूप में बालक जयरथजी को अपने बड़े-बड़े पंखों के नीचे इस तरह छुपा लिया कि सामने खड़े दुश्मनों को बच्चा कहीं दिखाई ही नहीं दिया। वे हैरान होकर वहां से लौट गए। चील (चिल पक्षी) का रूप धरकर राजकुल के बच्चे की जान बचाने के कारण ही तंवर समाज माँ को 'चिलाय माता' कहने लगा।
बुजुर्गों की बात: आज भी तंवर परिवारों में चील पक्षी को देखना बेहद शुभ माना जाता है और कोई भी तंवर राजपूत चील पक्षी को कभी नुकसान नहीं पहुँचाता। यह हमारे इतिहास और आस्था का एक अटूट हिस्सा है।
9. ग्वालियर और एसाहगढ़ के तंवर — वंश का पूर्वी विस्तार
दिल्ली की गद्दी छोड़ने के बाद तोमर राजपूतों की जो शाखा मध्य भारत की तरफ बढ़ी, उसने इतिहास में एक नया अध्याय लिखा। राजा तेजमाल के पुत्र अचलब्रह्म ने ग्वालियर के पास 'एसाहगढ़' को अपना नया केंद्र बनाया। उन्होंने वहां अपनी कुलदेवी का जो मंदिर बनवाया, वह आज भी तोमर सत्ता के धार्मिक और सांस्कृतिक गौरव की कहानी कहता है।
ग्वालियर के प्रसिद्ध तोमर राजा मानसिंह तोमर, जिन्होंने ग्वालियर किले के अंदर वो खूबसूरत 'मान मंदिर महल' बनवाया था, वे इसी कुलदेवी के परम भक्त थे। उनके वंशज जो बाद में बीकानेर, जोधपुर और जयपुर के अलग-अलग ठिकानों में जा बसे, वे आज भी अपनी कुलदेवी चिलाय माता को ही मानते हैं और समय-समय पर एसाहगढ़ और पाटन आकर माथा टेकते हैं।
🏰 ग्वालियर का किला और तोमर राजपूत
ग्वालियर के किले की दीवारों में आज भी तोमर राजाओं की वीरता के किस्से छुपे हैं। वहां के स्थानीय लोग बताते हैं कि राजा मानसिंह तोमर जब भी किसी बड़ी मुसीबत में होते थे, तो वे महल के गुप्त मार्ग से जाकर माता की आराधना करते थे और उन्हें हमेशा कोई न कोई दैवीय रास्ता मिल जाता था।
10. तोरावटी और सारंग (सारूड) माता — वैकल्पिक कुलदेवी स्थान
तंवरों के इस पूरे प्रभाव वाले क्षेत्र को 'तोरावटी' कहा गया। इस इलाके के जो राजपूत हैं, वे माता को 'सारंग माता' या 'सारूंड माता' के नाम से भी पुकारते हैं क्योंकि माता का मुख्य मंदिर सारूंड गाँव की ऊंची पहाड़ी पर स्थित है।
यहाँ गौर करने वाली बात यह है कि चाहे दिल्ली की मुख्य शाखा हो, ग्वालियर के तोमर हों या पाटन के तंवर—जगह बदलने से नाम भले ही थोड़े बदल गए, लेकिन मूल रूप से सब एक ही शक्ति माँ योगमाया के अलग-अलग स्वरूपों की पूजा करते हैं। यही इस वंश की सबसे बड़ी खूबी है कि सदियों के बिखराव के बाद भी उनकी कुलदेवी की आस्था का धागा आज भी सबको एक साथ जोड़कर रखता है।
💡 पढ़ें: कछवाहा वंश की कुलदेवी — इतिहास व मंदिर — सूर्यवंशी राजपूत वंश की जानकारी।
11. तंवर वंश की उप-शाखाएं और विस्तार
वक्त के साथ तोमर/तंवर राजवंश की कई वीर उप-शाखाएं अलग-अलग क्षेत्रों में जा बसीं। इनमें मुख्य रूप से निम्नलिखित शाखाएं शामिल हैं:
- दिल्ली के तोमर: राजा अनंगपाल तोमर से जुड़ी मुख्य शाखा, जो दिल्ली के आसपास की मूल गद्दी मानी जाती है।
- ग्वालियर के तोमर: अचलब्रह्म के वंशज जिन्होंने मध्य प्रदेश के चंबल और ग्वालियर संभाग में अपना डंका बजाया।
- पाटन के तंवर: राव भोपाजी तंवर का परिवार, जिन्होंने शेखावाटी और पाटन क्षेत्र को अपना ठिकाना बनाया।
- जाटू राजपूत: राव धोतजी और जयरथजी (जाटू सिंह) के वंशज, जो हरियाणा के भिवानी, हिसार और राजस्थान के कुछ हिस्सों में फैले।
- छोंकर तोमर: यह भी तोमर वंश की एक बेहद पराक्रमी उप-शाखा है जो पश्चिमी उत्तर प्रदेश और हरियाणा के कुछ इलाकों में बसी है।
12. इतिहास के प्रसिद्ध तंवर (तौमर) शासक
तंवर वंश के इतिहास को अपने शौर्य से सींचने वाले कुछ महान राजाओं के नाम इस प्रकार हैं:
- धर्मराज युधिष्ठिर और अर्जुन: महाभारत काल के वे महापुरुष जिनके कुल से इस वंश की शुरुआत हुई।
- महाराजा अनंगपाल तोमर प्रथम: जिन्होंने दिल्ली को दोबारा बसाया और लाल कोट का किला बनवाया।
- राजा मानसिंह तोमर (ग्वालियर): संगीत और कला के संरक्षक, जिन्होंने ग्वालियर के किले को एक नई भव्यता दी।
- राव भोपाजी तंवर: जिन्होंने अरावली की पहाड़ी पर पाटन के प्रसिद्ध चिलाय माता मंदिर का निर्माण करवाया।
- राजा रामशाह तोमर: ग्वालियर के वो वीर शासक जिनके परिवार ने बाद में राजस्थान में कई नए ठिकाने स्थापित किए।
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13. दर्शन, पूजा विधि और मेला
🙏 पाटन चिलाय माता मंदिर में पूजा विधि
पाटन के चिलाय माता मंदिर में आज भी सदियों पुरानी सात्विक परंपरा से पूजा की जाती. आम दिनों में माता की सेवा का समय इस प्रकार रहता है:
- मंगला आरती: सुबह सूरज निकलने से पहले 5:00 बजे माता के पट खुलते हैं और प्रथम आरती होती है।
- राजभोग: सुबह 7:30 से 8:30 बजे के बीच माता को शुद्ध लापसी और चूरमे का भोग लगाया जाता है।
- सांध्य आरती: शाम को गोधूलि बेला में सूर्यास्त के समय माँ की भव्य आरती होती है, जिसे देखने का अनुभव अद्भुत होता है।
🎉 वार्षिक मेला और जमीनी हकीकत
चैत्र और आश्विन के दोनों नवरात्रों में यहाँ का नजारा देखने लायक होता है। राजस्थान, हरियाणा और मध्य प्रदेश के तंवर परिवारों की गाड़ियां कोटपुतली रोड पर कतार में खड़ी दिखती हैं। मेले के दिनों में यहाँ इतनी भीड़ होती है कि पैर रखने की जगह नहीं मिलती, लेकिन माता के जयकारों और लांगुरिया भजनों के बीच सारी थकान मिनटों में गायब हो जाती है।
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14. पाटन मंदिर कैसे पहुँचें? (Complete Route Guide)
अगर आप पहली बार चिलाय माता के दर्शन का प्लान बना रहे हैं, तो यहाँ का रास्ता बेहद आसान है:
- 🚗 सड़क मार्ग (बाय रोड): यह सबसे बेस्ट ऑप्शन है। जयपुर से मंदिर की दूरी लगभग 111 किलोमीटर है और दिल्ली से करीब 250 किलोमीटर। आपको जयपुर-दिल्ली हाईवे (NH-48) पर चलते हुए 'कोटपुतली' पहुँचना है। कोटपुतली बस स्टैंड से नीमकाथाना वाले रास्ते पर मात्र 7 किलोमीटर आगे सारूंड गाँव की पहाड़ी साफ़ दिखाई देने लगती है। वहाँ के लिए लोकल ऑटो और जीप हर समय तैयार मिलते हैं।
- 🚆 रेल मार्ग (बाय ट्रेन): यदि आप ट्रेन से आना चाहते हैं, तो नजदीकी रेलवे स्टेशन नीमकाथाना या कोटपुतली रोड पड़ता है। वहाँ उतरकर आप आधे घंटे में टैक्सी के जरिए सीधे मंदिर की तलहटी तक पहुँच सकते हैं।
- ✈️ हवाई मार्ग द्वारा (By Air): अगर आप बहुत दूर से आ रहे हैं और फ्लाइट का प्लान है, तो सबसे पास 'जयपुर इंटरनेशनल एयरपोर्ट' पड़ता है। वहाँ से आप सीधे टैक्सी बुक करके वाया कोटपुतली होते हुए करीब दो से ढाई घंटे में आराम से पाटन पहुँच सकते हैं।
🚩 दर्शन के लिए सबसे अच्छा समय: मौसम के हिसाब से देखें तो अक्टूबर से मार्च के बीच यहाँ का मौसम एकदम सुहाना रहता है। गर्मियों में पहाड़ियों पर धूप तेज होती है। अगर आपको यहाँ का असली रंग और सांस्कृतिक मेला देखना है, तो मार्च-अप्रैल वाले चैत्र नवरात्रि के समय आना सबसे बेस्ट रहेगा।
15. अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न — तंवर वंश की कुलदेवी (FAQs)
❓ तंवर या तौमर वंश की कुलदेवी कौन हैं?
तंवर (तौमर) वंश की कुलदेवी साक्षात आद्यशक्ति श्री चिलाय माता (योगमाया/योगेश्वरी) हैं। ये माता दिल्ली के महरौली में योगमाया मंदिर और राजस्थान के पाटन (अरावली पर्वत) में चिलाय माता मंदिर के रूप में पूजी जाती हैं। तोरावटी क्षेत्र में इन्हें सारंग (सारूड) माता के नाम से भी जाना जाता है।
❓ तंवर वंश का इतिहास क्या है?
तंवर वंश चंद्रवंशी क्षत्रिय राजपूतों का प्रमुख वंश है जो महाभारत काल के पांडवों के सीधे वंशज हैं। पांडवों ने इन्द्रप्रस्थ (दिल्ली) को राजधानी बनाया और भगवान श्री कृष्ण की उपस्थिति में योगमाया का मंदिर स्थापित करवाया। बाद में महाराजा अनंगपाल तौमर ने इस मंदिर का पुनर्निर्माण करवाया। तंवरों ने दिल्ली, ग्वालियर, पाटन और तोरावटी में शासन किया।
❓ चिलाय माता का मंदिर कहाँ स्थित है?
चिलाय माता का मुख्य मंदिर राजस्थान के जयपुर से 111 कि.मी. दूर जयपुर-दिल्ली रोड पर कोटपुतली से 7 कि.मी. दूर नीमकाथाना मार्ग पर अरावली श्रंखला की पहाड़ी पर स्थित है। इसे पाटन चिलाय माता मंदिर भी कहा जाता है। दिल्ली में महरौली का योगमाया मंदिर भी तंवरों का प्राचीन कुलदेवी स्थान है।
❓ तंवर वंश का गोत्र क्या है?
तंवर (तौमर) वंश के मुख्य गोत्र अत्रि, व्यागर और गागर्य हैं। प्रवर 'गागर्य, कौस्तुभ, माडषय' है। वंश चंद्रवंशी है, वेद यजुर्वेद, कुलदेवी चिलाय माता (योगमाया), इष्टदेव शिव, गुरु सूर्य और ध्वज पंचरंगा माना जाता है।
❓ योगमाया मंदिर दिल्ली का तंवर वंश से क्या संबंध है?
दिल्ली के महरौली में स्थित योगमाया मंदिर का सीधा संबंध तंवर वंश से है। महाभारत काल में पांडवों ने श्री कृष्ण जी की उपस्थिति में योगमाया का मंदिर बनवाया था। बाद में दिल्ली के प्रथम तौमर शासक महाराजा अनंगपाल जी ने इस मंदिर का पुनर्निर्माण करवाया। यही योगमाया आगे चलकर चिलाय माता और सारंग देवी के नाम से प्रसिद्ध हुईं।
❓ चिलाय माता को योगमाया और सारंग देवी क्यों कहा जाता है?
चिलाय माता को योगमाया/योगेश्वरी इसलिए कहा जाता है क्योंकि पांडवों ने महाभारत काल में श्री कृष्ण जी की उपस्थिति में इन्हें योगमाया के रूप में स्थापित करवाया था। 'चिलाय' नाम इसलिए पड़ा क्योंकि माता ने चील (पक्षी) का रूप धारण कर राव धोतजी के पुत्र जयरथजी की रक्षा की थी। तोरावटी क्षेत्र में इन्हें सारंग (सारूड) माता कहा जाता है क्योंकि उनका मुख्य स्थान सारूड गाँव की पहाड़ी पर है।
❓ तंवर वंश के प्रमुख शासक कौन-कौन थे?
तंवर वंश के प्रमुख शासकों में महाराजा अनंगपाल तौमर प्रथम (दिल्ली के संस्थापक), राव भोपाजी तंवर (पाटन), राव धोतजी, जयरथजी जाटू सिंह, रामशाह तौमर (ग्वालियर), तेजमाल (दिल्ली के अंतिम तौमर शासक 1192-1193) और अचलब्रह्म (एसाहगढ़) प्रमुख हैं।
❓ तंवर और तौमर में क्या अंतर है?
तंवर और तौमर एक ही वंश के दो नाम हैं। संस्कृत के इतिहासकार और लेखक 'तंवर' को 'तौमर' लिखते हैं। दोनों नाम चंद्रवंशी पांडव वंशज क्षत्रिय राजपूतों के लिए प्रयुक्त होते हैं जिनका मूल क्षेत्र दिल्ली-हस्तिनापुर, ग्वालियर, पाटन और तोरावटी रहा है।
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13 टिप्पणियाँ
Hamen Chalaye Mata ka sampurn Itihaas chahie Ham Maharashtra Bhusawal Jilla Jalgaon shahar mo 0 7888276665
जवाब देंहटाएंथैंक यू धन्यवाद
जवाब देंहटाएंतोमर वंश के कुल देवता कौन है
जवाब देंहटाएंस्वयं श्रीकृष्ण 🚩
हटाएंचिल्लाय माता
हटाएंतोमर राजवंश के कुल देवता हैं
हटाएंरामदेव जी महाराज
बहुत ज्ञानवर्धक पोस्ट मैं तोमर जिला मेरठ का रहने वाला हूं। मैं दिल से यात्रा की कामना करता हूं। हमारी कुलदेवी मुझे अपने दर्शन करने का सौभाग्य प्रधान करें। राधे राधे
जवाब देंहटाएंशिव जी
जवाब देंहटाएंतोमर वंश के कुल भैरव श्री गौरा भैरव का प्रमुख मंदिर कहा स्थित है
जवाब देंहटाएंस्वयं श्रीकृष्ण 🚩
जवाब देंहटाएंमुझे हमारी कुलदेवी के बारे में पहले कुछ भी नही पता था परंतु आपके द्वारा दी गई जानकारी से माता जी के दर्शन करने को बहोत मन कर रहा है जल्द ही माता के दर्शन को जाऊंगा जय हो चिलाय माता रानी की
जवाब देंहटाएंBahut hi acha kiya apne hamare vansh k liye
जवाब देंहटाएंजय हो माँ चिलाय जय गोपाल जी की जय श्री महाकाल
जवाब देंहटाएं